खरगोन। निमाड़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने के लिए 1952 में निमाड़ के जिन कर्णधारों ने बीड़ा उठाया था, उसे अखिल निमाड़ लोक परिषद के कुछ तथाकथित लोग पलीता लगा रहे हैं। सम्मान में भी भाई-भतीजावाद चरम पर है। संगठन की नींव में कुछ लोग हठधर्मिता का एसिड डालकर उसे खोखला कर रहे हैं। निमाड़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने के नाम पर केवल अपना उल्लू साधने का काम हो रहा है। ऐसे में कई जन्मों तक निमाड़ी को भाषा दर्जा नहीं मिलेगा। ये आरोप उन लोगों ने लगाए हैं जो निमाड़, निमाड़ी और निमाड़ी संस्कृति से 50 सालों से जुड़े हैं। उन्होंने कहा यहां अंधा बांटे रेवड़ी, अपने-अपने को दें, कहावत चरितार्थ हो रही है।
दरअसल अखिल निमाड़ लोक परिषद द्वारा हर वर्ष की भांति खरगोन जिला मुख्यालय के हरियाली मैरिज गार्डन में निमाड़ी दिवस मनाया जा रहा था। परिषद ने घोषणा की है कि 24 आंचलिक प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाएगा लेकिन इस बार सम्मान वितरण को लेकर कड़ा विरोध शुरू हो गया। परिषद द्वारा घोषित भावसिंग बाबा सम्मान गिरीश उपाध्याय को और वीरपस सम्मान शरद त्रिवेदी को दिए जाने की घोषणा होते ही स्थानीय साहित्य जगत में सवाल खड़े हो गए हैं? आरोप है कि परिषद ने चयन में भाई- भतीजावाद और पक्षपात का सहारा लिया। कई वरिष्ठ रचनाकारों और वास्तविक योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं के नाम पूरी तरह दरकिनार कर दिए गए। सेगांव के शर्मा परिवार के तीन सदस्यों को लगातार प्रतिभा सम्मान देने पर भी लोगों ने आपत्ति ली है। उनका कहना है पिछले साल अध्यक्ष और संरक्षक जीवनलाल शर्मा को सम्मान मिला और फिर उनकी शिक्षिका बहू योगिता शर्मा को मनरंगगीर सम्मान से सम्मानित किया गया। सांस्कृतिक मंचों और साहित्यकारों का आरोप है कि परिषद सम्मान को ईमानदारी से बांटने की बजाय “अपने लोगों” को आगे बढ़ाने का जरिया बना रही है। उनका कहना है कि नकद राशि, शाल और श्रीफल की आड़ में ये पूरा आयोजन केवल दिखावा बनकर रह गया है। विरोधियों ने मांग की है कि परिषद सार्वजनिक रूप से ये बताए कि चयन समिति में कौन-कौन सदस्य शामिल थे और किन मानदंडों के आधार पर इन 24 नामों का चयन किया गया। जब तक यह पारदर्शिता नहीं आती, तब तक निमाड़ी दिवस के ये सम्मान संदेह और विवादों से घिरे रहेंगे।
आयोजक को नहीं मालूम 19 सिम्बर को क्यों मनाते हैं ये दिवस-
जब हमने जिपलेप में मुख्य पद और साहित्यिक गतिविधि में सक्रिय रहे खरगोन के मोदी जी से ये पूछा कि आखिर 19 सितम्बर को ये दिवस क्यों मनाया जाता है तो उनका कहना था मुझे भी इस बारे में नहीं पता है। गौरतलब है निमाड़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने वाली संस्था में कई सदस्य ऐसे भी हैं, जिन्हें खुद निमाड़ी का नअ नहीं आता। वे संबोधित भी हिंदी में ही करते हैं।
आयोजकों को खुश करने के लिए कुछ को देते हैं सम्मान-
जब हमने आयोजन को लेकर और भाई-भतीजावाद, परिवारवाद को जारी रखते हुए ऐसे लोगों को सम्मानित करने का सवाल किया कि जिन्होंने जीवन में कभी समाज सेवा का रत्तीभर भी काम नहीं किया, उन्हें क्यों सम्मान दिया जा रहा है? इस बात पर साहित्य के क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखने वाले आयोजक महोदय ने कहा कभी-कभी आयोजन को सफल बनाने और कुछ आयोजकों को खुश करने के लिए इस तरह के समझौते भी करना पड़ते हैं।
स्मारिका पर भी उठे सवाल-
कुछ लोगों का कहना है इस गौरवशाली कार्यक्रम के लिए हर साल हर वर्ष जो स्मारिका तैयार की जाती है, उसमें ना तो निमाड़ की प्रतिभाओं को स्थान मिलता है और ना ही निमाड़ी बोली को लेकर किसी रचना, साहित्य को शामिल किया जाता है। पुस्तिका में केवल संस्था के लोगों की तस्वीर शामिल होती है जिसका निमाड़ी बोली से कोई सरोकार नहीं होता।
