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हे राम! 18 मृत किसानों के नाम पर विदेशों में बेचा जैविक टैग लगा कपास?

ग्राउंड रिपोर्ट-

खरगोन। जिले की एक विकासखंड में वर्षों पहले मर चुके 18 किसानों के नाम पर विदेशों में बेचा जैविक टैग लगा कपास। भोले-भाले आदिवासी किसानों को पता चला तो दंग रह गए। हैरत की बात ये है कि खरगोन कपास मंडी सहित जिलेभर की मंडियों में एक वर्ष में एक किलो  भी जैविक कपास नहीं आया। जैविक उपज खरीदने के लिए जिले की 6 मंडियों में प्लेटफार्म बने हैं। सामान्य कपास पर जैविक का टैग लगाकर विदेशों में कपास बेचकर जैविक माफिया करोड़ों का खेल का खेल कर रहा। ग्राउंड पर किसानों को खबर ही नहीं वे कब बन गए जैविक कपास उत्पादक किसान। 

खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर झिरन्या विकासखंड में 80 फीसदी आदिवासी रहते हैं। पूरे विकासखंड में एक एकड़ क्षेत्र में भी जैविक कपास की खेती नहीं होती। फिर भी ऑर्गेनिक कपास माफिया ने कागजों पर विकासखण्ड के कई गांवों में जैविक कपास की खेती चढ़ा दी। गांवों के किसानों को इस बात की भनक तक नहीं है। जब हमने झिरन्या विकासखंड के गांवों की पड़ताल की तो चौकानें वाली बात सामने आई। ग्राम पंचायत घोड़ी बुजुर्ग के सरपंच लखन बामनिया का कहना है जैविक कपास उत्पादकों की जो सूची है उसमें 18 किसान ऐसे हैं, जिनकी 2006 से अब तक मौत हो चुकी है और पिछले 20 साल से कोई भी किसान जैविक खेती नहीं कर रहा। 

18 किसान वर्षों पहले मर चुके फिर भी नाम-

ग्राम पंचायत घोड़ी बुजुर्ग में वर्ष 2006 से लेकर 2025 तक ग्राम पंचायत क्षेत्र में करीब 18 लोगों की मौत हो चुकी है। इन सभी मरने वालों के नाम जैविक कपास खेती वालों की सूची में हैं। ग्राम पंचायत सरपंच की माने तो जिन लोगों के नाम सूची में हैं वे सभी मर चुके हैं। 

ढाई साल पहले हो चुकी है मौत, कागजों में जिंदा- 

जामन्यापानी गांव के किसान गोइन्दा चौहान की ढाई साल पहले रासायनिक दवाई पीने से मौत हो गई थी। सूची में उनका भी नाम है। मरे हुए लोगों के नाम पर जैविक खेती जोड़कर राशि निकाली जा रही है। मृतक की तस्वीर लेकर खड़ी उनकी पत्नी और भाई माला चौहान ने गोइन्दा की मरने की पुष्टि की।

कभी कपास लगाया ही नहीं-

घोड़ी बुजुर्ग पंचायत के नांदिया के किसान सृजन का कहना है मृतक लकड़िया पिताजी हैं और केकड़िया काकाजी हैं। 2006 और 2024 में दोनों शांत हो चुके हैं। हमने हमेशा मक्का और सोयाबीन लगा है कपास आज तक नहीं लगाया। जैविक खेती हमने कभी नहीं की और ना ही आज तक कपास लगाया। सुपर, यूरिया और डीएपी खाद का उपयोग करते हैं बाकी जानकारी नहीं है। 

कागजों पर किसान, ग्राउंड पर जीरो खेती-

किसानों का कहना हैं, उन्हें जैविक खेती करने के लिए किसी ने कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया, ना बीज दिया। ना कोई.. भौतिक सत्यापन  करने आया.. ना हीं किसी ने हमारे मिट्टी की लेबोरेट्री मे टेस्टिंग की। तो फिर कैसे एपीडा से अनुमोदित.. सर्टिफिकेशन बॉडी ब्यूरो वरिटॉस ने आईसीएस ग्रीन वर्ल्ड को किस आधार पर जैविक किसान समहू.. जैविक प्रमाणित कर दिया। 

हमें पता नहीं हम जैविक कपास उत्पादक हैं?

घोड़ी बुजुर्ग के पूर्व जनपद सदस्य चमार सिंह सेनानी का कहना है हमको आज तक इसके बारे में पता नहीं था। मुझे भी नहीं मालूम था मेरा नाम उसमें शामिल है। गांव में 500 किस है और उनके नाम से जैविक करते हैं ऐसा बोल रहे हैं। हमारे 500 किस ऐसे हैं जो आज तक जैविक जानते तक नहीं। हम यह चाहते हैं कि हमारे नाम से जो फर्जी बड़ा हुआ है इस मामले की जांच की जाए और कागजों पर जैविक खेती बताने वालों पर कार्रवाई की जाए। हमारा छोटा सा गांव जामनियापानी है यहां पर चार-पांच किसने की मौत हुई है और आसपास के कई गांव की किसानों के नाम है। 20-30 किस मरे हुए हैं उनके नाम भी जैविक खेती में शामिल कर लिए हैं। हम तो 20-25 साल से रासायनिक खेती कर रहे हैं हमारे जो बुजुर्ग थे वे भी यही खेती करते थे। जैविक खेती कोई नहीं करता है। 

घोटाले का प्रदेश- पूर्व कृषि मंत्री

पूर्व कृषि मंत्री और कसरावद के विधायक सचिन यादव का कहना है हमारे पूरे प्रदेश की छवि घोटाले के प्रदेश के रूप में बनती जा रही है। एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं हम जिनकी कल्पना भी नहीं कर सकते ऐसे घोटाले भी आए हैं। निश्चित रूप से जैविक का घोटाला हुआ है जिस तरह से जैविक का नाम लेकर अमानक सामग्री प्रदाय की गई है। इससे न केवल मध्य प्रदेश का नाम खराब हुआ है खरगोन जिले का नाम भी खराब हुआ है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश की छवि खराब हुई है। 

हम तो यूरिया, डीएपी का उपयोग करते हैं-

युवा किसान सूजन का कहना है गांव में कोई भी किसान जैविक खेती नहीं करता है हम तो यूरिया, डीएपी का उपयोग करते हैं। बहुत सारी दवाईयों का उपयोग भी करते हैं। हम सबके नाम फर्जी जोड़ रखे हैं कोई भी यहां जैविक खेती नहीं करता है। 

कोई किसान जैविक कपास नहीं लाया-मंडी सचिव

खरगोन कृषि उपज मंडी सचिव शर्मिला निनामा का कहना है कपास मंडी में 4 लाख 96 हजार क्विंटल कपास की आवाक हो चुकी है। सीसीआई के द्वारा भी कपास की खरीदी की जाती है। जैविक कपास के लिए वरिष्ठ कार्यालय के निर्देश पर सभी मंडियों में जैविक कपास खरीदी के लिए अलग से प्लेटफार्म तैयार किए गए हैं। इसी के चलते खरगोन में भी कपास मंडी और अनाज मंडी में दो स्थानों पर जैविक के लिए प्लेटफार्म तैयार किए गए हैं लेकिन कोई भी किसान जैविक उत्पाद नहीं लाता। किसानों के द्वारा अगर बताया जाता है कि हम जैविक उत्पाद लाए हैं तो उसके अलग से नीलामी की जाती है लेकिन अब तक जैविक कपास बिक्री हेतु नहीं आया है। 

फैक्ट-

-खरगोन जिले में करीब ढाई लाख कपास उत्पादक किसान हैं।

-1 लाख 90 हजार हेक्टेयर में सामान्य कपास लगाया जाता है।

-कपास का सामान्य रूप से भाव 7 से करीब 10 हजार रुपये प्रति क्विंटल। 

-ऑर्गेनिक कपास के नाम पर विदेशों में बेचा जाता है 60 से 80 हजार प्रति क्विंटल।

-ग्रामीण किसानों को पता ही नहीं और उनके नाम पर समिति बनाकर जैविक कपास उत्पादक बताया। 

– कृषि उपज मंडी खरगोन में कभी भी जैविक कपास बचने के लिए कोई किसान नहीं पहुंचा।

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